Friday, 18 April 2014

“परछाइयों के उजाले” – आईना ज़िंदगी का

कविता वर्मा जी के कहानी लेखन से पहले से ही परिचय है और उनकी लिखी कहानियां सदैव प्रभावित करती रही हैं. उनका पहला कहानी संग्रह “परछाइयों के उजाले” हाथ में आने पर बहुत खुशी हुई. पुस्तक को एक बार पढ़ना शुरू किया तो प्रत्येक कहानी अपने साथ भावों की सरिता में बहा कर ले गयी. ज़मीन से जुड़ी कहानियों के कथ्य, पात्र और भाव अपने से लगते हैं और अहसास होता है कि जैसे अपने घर आँगन में पसरे हुए हालात, कमरे की खिड़की से झांकते हुए आस पडौस की दुनियां को देख रहे हैं. जीवन के विभिन्न आयाम कहीं नारी मन की व्यथा, अंतर्द्वंद और उसका आत्म-विश्वास, कहीं रिश्तों के दंश तो कहीं प्रेम के विभिन्न अहसास कहानियों में प्रखरता से उभर कर आये हैं. समाज के अभिजात्य, मध्यम एवं पिछड़े वर्गों की वेदना और मज़बूरी को लेखिका ने बहुत प्रभावी ढंग से रेखांकित किया है. कहानियों का कथ्य व शैली किसी भी वाद से परे है और कहानियां केवल कहानियां हैं – जीवन के यथार्थ का दर्पण - और यही विशेषता पाठक को कहानियों से अंत तक बांधे रखती है. कहानियों का शिल्प व भाषा सहज और सरल है और अंत तक रोचकता बनाये रखने में सक्षम है.

‘एक नयी शुरुवात’ की स्नेह और ‘जीवट’ की फुलवा आत्म-विश्वास से परिपूर्ण ऐसी नायिका हैं जो किसी भी हालात का जीवट से सामना कर सकती हैं. समृद्ध परिवार की स्नेह एक तरफ़ अपनी भावनाओं और प्रेम के लिए अपने परिवार से संघर्ष को तैयार हो जाती है वहीँ वह एक व्यावहारिक सोच का सहारा लेकर ऐसा निर्णय लेती है जो उसके जीवन की दिशा ही बदल देता है. फुलवा एक  गरीब पिछड़े वर्ग की एक प्रतिनिधि पात्र है जो स्वयं मेहनत मज़दूरी कर के घर का खर्चा चलाती है लेकिन जब उसके स्वाभिमान और ममता को चोट लगती है तो वह एक निर्णय लेती है ‘मुझे किसी के सहारे की क्या जरूरत है औरत हूँ तो क्या?’. यही आत्म-विश्वास और व्यावहारिकता ही दोनों कहानियों का सशक्त पक्ष है.

कितना आसान होता है रिश्तों को सगों और सौतेलों की परिभाषाओं से बाँट देना. सम्पत्ति के बंटवारे की आशंका से स्नेह के रिश्तों पर भी सौतेलेपन की धूल जमने लगती है और निस्वार्थ स्नेह को भी आशंका की दृष्टि से देखा जाने लगता है. संपत्ति के लालच में सौतेले संबंधों के स्नेह पर संदेह करना जब कि अपना खून भी आज कल संपत्ति के लालच से परे नहीं है , इन्ही सब प्रश्नों से जूझती कहानी ‘सगा सौतेला’ आज के बदलते रिश्तों की सच्चाई को बहुत संवेदनशीलता से चित्रित करती है.

व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए किस तरह एक गरीब की मज़बूरी और परेशानियों का किस हद तक भावनात्मक शोषण कर सकता है इसकी प्रभावी अभिव्यक्ति है कहानी ‘निश्चय’. मालकिन रेनू के अहसानों से दबी मंगला के सामने जब उसकी सहायता के पीछे रेनू का स्वार्थ और दोगलापन स्पष्ट हो जाता है तो वह निश्चय लेने में एक पल की देर नहीं करती. समाज में व्याप्त स्वार्थ और दोगलेपन को लेखिका ने इस कहानी में बहुत गहराई से रेखांकित किया है.

‘पुकार’ एक ऐसी भावपूर्ण कहानी है जिसका प्रस्तुतिकरण इतना स्वाभाविक और सहज है कि लगता नहीं कि आप कोई कहानी पढ़ रहे हैं. एक एक शब्द भावों का समंदर है. कहानी का अंत अन्दर तक झकझोर देता है.

अगर एक माँ एक बच्चे को पीटती है तो यह उसका अधिकार समझा जाता है, लेकिन एक निस्संतान स्त्री अगर उस बच्चे को जिसे वह अपने पुत्र की तरह पालती है और उसमें अच्छी आदतें डालने के लिए सख्ती करती है तो उसे अत्याचार समझा जाता है और सभी उंगलियाँ उसकी ओर उठने लगती हैं. एक निस्संतान स्त्री का दर्द ‘लकीर’ कहानी में बहुत शिद्दत और मार्मिकता से उभर कर आया है.

पुरुष प्रधान समाज में विशेषकर ग्रामीण परिवेश में जब स्त्री पर घर के सदस्य की ही कुदृष्टि हो उस स्त्री की मनोदशा को ‘आवरण’ कहानी में बड़े प्रभावी ढंग से उकेरा है. एक असहाय स्त्री को जब एक दूसरी असहाय सी प्रतीत होने वाली जेठानी का सहारा मिल जाता है तो वह हरेक हालात से मुकाबला करने को खड़ी हो जाती है. सुकुमा और उसकी जेठानी का चरित्र चित्रण कहानी का एक सशक्त पक्ष है.

‘एक खालीपन की नायिका’ माया एक आज की नारी है जिसने अपनी माँ को सदैव पिता के डर के तले जीते देखा. लेकिन माया की सोच है ‘क्यों किसी के लिए जिए जिन्दगी? क्या मिलेगा इस तरह अपनी जिन्दगी किसी और के पास गिरवी रख कर?’ नारी का स्वाभिमान पुरुष के अहम् को सहन नहीं होता और वह चाहता है कि नारी अपना अस्तित्व भूल कर उसके अहम् को पोषित करे. माया को यह स्वीकार नहीं कि वह किसी के अहम् को संतुष्ट करते करते खुद चुक जाए, अकेलेपन के ‘खालीपन में कम से कम वह खुद के साथ तो है.’ माया के मानसिक द्वन्द को कहानी में बहुत ही प्रभावी ढंग से उकेरा गया है. यह कहानी केवल माया की कहानी नहीं बल्कि प्रत्येक उस नारी के मानसिक संघर्ष की कहानी है जो अपने अस्तित्व और स्वाभिमान को किसी के पैरों तले कुचलता नहीं देख सकती.

परिवार में या समाज में जब कमजोर व्यक्ति आगे बढ़ने और अपना अस्तित्व व वर्चस्व बनाने की कोशिश करता है तो परिवार के सदस्यों या समाज के चौधरियों को अपनी स्थापित प्रतिष्ठा डगमगाती दिखाई देने लगती है और फिर होता है प्रयत्न उसको नीचा दिखाने का. ‘दलित ग्रंथी’ कहानी में इसी संघर्ष को बहुत प्रभावी रूप में उजागर किया है. कहानी के चरित्र अपने से और जीवंत लगते हैं और यही कहानी का सबसे बड़ा आकर्षण है.

‘डर’ और ‘पहचान’ ऐसी समसामयिक कहानियां हैं जो बिल्कुल स्वाभाविक और विश्वसनीय लगती हैं. जब नारी को अपनों के द्वारा ही छला जाये तो वह अपने आप को कितनी कमजोर और लाचार पाती है, लेकिन अगर उसे सही समय पर सहारा और मार्गदर्शन मिल जाए तो वह किसी भी मुसीबत का सामना कर सकती है. ‘डर’ की नायिका को जब आंटी जी का सहारा मिल जाता है तो वह सब डर भूल कर परिस्थितियों का सामना करने को तैयार हो जाती है. ‘पहचान’ की वेदिका पति की मृत्यु के बाद जब अपने आप को अपनों के बीच अजनबी पाती है और टूट जाती है तो राधिका और आशा उसका हाथ पकड़ कर उसे सहारा देती हैं और उनके सहारे और अपने साहस से वह अपनी एक ऐसी पहचान बना पाती है जिसके सामने सब नत मस्तक हो जाते हैं. दोनों कहानियां अंतस को गहराई तक छू जाती हैं.

‘परछाइयों के उजाले’ स्त्री मन की भावनाओं को समझने का एक बहुत गहन प्रयास है. स्त्री पुरुष के बीच केवल शारीरिक संबंध ही नहीं होता, उनके बीच दोस्ती का भावनात्मक लगाव भी हो सकता है, लेकिन इसे समाज सदैव शक़ की नज़रों से देखता है. उम्र के ढलते पड़ाव में भी किसी पर-पुरुष के सानिध्य में भावनात्मक ख़ुशी का अहसास करने में भी समाज का डर नारी जीवन का एक ऐसा दर्द है जिसे कहानी में बहुत ही संवेदनशीलता से उकेरा है.

जीवन के इर्द गिर्द घूमती कहानियां पाठक को अंत तक अपने साथ बांधे रखती हैं. एक पठनीय और संग्रहणीय कहानी संग्रह के लिये लेखिका बधाई की पात्र हैं. विश्वास है कि कविता जी की लेखनी से ऐसे कहानी संग्रह आगे भी पढ़ने को मिलते रहेंगे. पुस्तक प्राप्ति के लिए कविता वर्मा जी से E-mail ID kvtverma27@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

पृष्ठ  : 142
मूल्य : Rs.150/-
प्रकाशक : मानव संस्कृति प्रकाशन, इंदौर


.....कैलाश शर्मा 

Friday, 28 February 2014

“ एक थी माया” – कहानी संग्रह

श्री विजय कुमार जी का कहानी संग्रह ‘एक थी माया’ हाथ में आते ही उसके आवरण ने मंत्र मुग्ध कर एक माया लोक में पहुंचा दिया. जब मैं पुस्तक के पृष्ठ पलट ही रहा था कि मेरी धर्म पत्नी जी मेरे हाथ से पुस्तक लेकर देखने लगीं और बोलीं कि विजय जी की नयी पुस्तक है. मुझे विश्वास था कि उन्हें लम्बी कहानियां पढ़ने का धैर्य नहीं है और उनकी रूचि केवल कविताओं और लघु कथाओं तक ही सीमित है, इसलिए पुस्तक शीघ्र ही मेरे हाथों में वापिस आ जायेगी. लेकिन जब वे पृष्ठ पलटना बंद करके कहानियाँ पढ़ने लगीं तो मुझे आश्चर्य हुआ, लेकिन सोचा कुछ पृष्ठ पढ़ कर अपने आप वापिस कर देंगी. जब एक घंटे तक पुस्तक नहीं मिली तो मैंने उनसे वह पुस्तक माँगी तो उन्होंने कहा कि मैं पढ़ कर ही दूंगी. यद्यपि मैं विजय जी कि कुछ कहानियों से पहले से ही वाकिफ़ था लेकिन जब उन्होंने पूरी पुस्तक पढ़ कर मुझे वापिस दी तो मुझे विश्वास हो गया कि इस कहानी संग्रह की कहानियों में अवश्य कुछ ऐसा है जो किसी को भी अपनी और आकर्षित करने की क्षमता रखता है.

विजय जी की कहानियां एक वृहद कैनवास पर जीवन के विभिन्न आयामों को अनेक रंगों में चित्रित करती हैं जिसमें रूहानी प्रेम का रंग सबसे प्रमुख है. कहानियों को पढ़ते हुए भूल जाते हैं कि कहानी में जीवन है या जीवन में कहानी है. कहानी के चरित्रों से पाठक पूरी तरह आत्मसात हो जाता है और कई बार लगता है कि यह तो मेरी कहानी है और यह किसी भी कहानी की सफलता का सशक्त मापदंड है. सभी कहानियों का कथ्य, शैली, चरित्र चित्रण, और कथा विन्यास सबसे सशक्त पक्ष है.

एक आम आदमी की अभावग्रस्त ज़िंदगी के छोटे छोटे मासूम अहसास और देह से परे निश्छल अनुभूतियाँ, प्रेम और जीवन की आधारभूत ज़रूरतों के बीच संघर्ष और दोनों के बीच पिसता इंसान और उसकी भावनाओं का एक मर्मस्पर्शी चित्रण है ‘एक थी माया’. शरीर से परे भी एक प्रेम है और मिलन ही प्रेम का अंतिम उद्देश्य नहीं, इसे माया ने बहुत गहराई से समझा है “ऐसा कोई दिन नहीं जब मैं तुम्हें याद नहीं करती हूँ, पर तुम नहीं होकर भी मेरे पास ही रहते हो.”

‘मुसाफ़िर’ एक छोटी सी कहानी जीवन में प्रेम से बिछुड़ने और मिलन के लम्बे इंतजार की ऐसी मर्मस्पर्शी कहानी है जिसका अंत आँखें नम कर जाता है.

जब नारी के असंतुष्ट विवाहित जीवन में उसका अतीत फिर से जीवंत हो कर आ जाता है और वह निश्चय नहीं कर पाती की घर की देहरी पार करे या नहीं, उसके मानसिक संघर्ष को चित्रित करती ‘आठवीं सीढ़ी’ एक सशक्त कहानी है. एक लम्बी कहानी होते हुए भी लेखक की चरित्रों, कथानक और भावनाओं पर पकड़ इतनी मज़बूत है कि कहानी कहीं भी उबाऊ नहीं हो पाई और अंत तक पाठक की रोचकता बनी रहती है. नायिका के अतीत के साथ जुड़ने और वर्तमान हालात से असंतुष्टि के बीच मानसिक संघर्ष का जो उत्कृष्ट मनोवैज्ञानिक चित्रण है वह कहानी का सबसे सशक्त पक्ष है. यहाँ भी प्रेम का रूहानी पक्ष प्रखरता से उभर कर आया है. “प्रेम का कैनवास बहुत बड़ा होता है, उसे जीना आना चाहिए, न कि ज़िंदगी में उसकी कमी से भागना. यही सच्चा प्रेम है और इसी को ईश्वरीय प्रेम कहते हैं...”

प्रेम में हर बार चोट खाने पर भी अपने स्वाभिमान को बरकरार रख कर जीने की कोशिश और प्रेम की तलाश है एक भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी कहानी ‘आबार एशो’. “श्रीकांत बहुत देर तक उसे देखता रहा. फिर धीरे से कहा, ‘तुम बहुत बरस पहले मुझसे नहीं मिल सकती थीं, अनिमा?’ अनिमा ने कहा, ‘ज़िंदगी के अपने फैसले होते हैं, श्रीकांत.’ ’’ शायद यही ज़िंदगी का सबसे बड़ा सत्य है.

ऐतिहासिक प्रष्ठभूमि पर एक विश्वसनीय कहानी लिखना और उस समय का वातावरण, भाषा, रहन सहन, लोकाचार एवं चरित्रों को जीवंत करना एक आसान कार्य नहीं है. लेकिन कहानीकार अपनी कहानी ‘आसक्ति से विरक्ति की ओर’ में इसमें पूर्ण सफल रहा है. बुद्धकालीन प्रष्ठभूमि में लिखी कहानी में बुद्ध के संदेशों को न केवल आत्मसात किया है बल्कि उन्हें बहुत गहनता से कहानी में इस कुशलता से ढाला है कि वह कहानी का ही एक अभिन्न अंग बन गए हैं.
“बुद्ध ने आगे कहा, ‘हम अपने विचारों से ही स्वयं को अच्छी तरह ढालते हैं; हम वही बनते हैं जो हम सोचते हैं, जब मन पवित्र होता है तो ख़ुशी परछाई की तरह हमेशा हमारे साथ चलती है, सत्य के रास्ते पर चलने वाला मनुष्य कोई दो ही ग़लतियाँ कर सकता है, या तो वह पूरा सफ़र तय नहीं करता या सफ़र की शुरुआत ही नहीं करता, मनुष्य का दिमाग ही सब कुछ है, जो वह सोचता है वही बनता है, और यही सच्चा सन्यास है.’ “

आधुनिकता और भौतिक सम्रद्धि के पीछे भागते युग में अकेलेपन की त्रासदी झेलती बुजुर्गों की कहानी ‘चमनलाल की मौत’ केवल एक कहानी नहीं बल्कि ऐसी कटु सच्चाई है जो हर रोज़ हम अपने आस पास देखते हैं. आधुनिक पीढ़ी द्वारा दिया अकेलेपन का दंश झेलते जाने कितने बुज़ुर्ग एक पल के प्यार को तरसते हैं अपने ज़िन्दगी के अंतिम पल तक. “ ...लेकिन यह कोई नहीं समझ पाता कि हम बूढों को पैसे से ज्यादा प्यार चाहिए. अपनों का अपनापन चाहिए. हमें ज़िंदगी नहीं मारती; बल्कि एकांत ही मार देता है.” आज के कटु सत्य को दर्शाती कहानी आँखों को नम कर जाती है.

प्रसिद्धि और नाम पाने के लिए व्यक्ति क्या क्या कर सकता है इस पर ‘अटेंशन’ एक बहुत सटीक और रोचक व्यंग है और इस बात का सबूत है कि विजय जी केवल गंभीर कहानी लिखने में ही कुशल नहीं हैं, वे व्यंग के भी सिद्धहस्त चित्रकार हैं.

‘टिटलागढ की एक रात’ कहानी में कहानीकार ने भय, रोमांच, सस्पेंस के वातावरण का कुशलता से ऐसा ताना बुना बुना है कि आप कहानी के प्रवाह के साथ बहते चले जाते हैं और आपकी तर्क शक्ति और व्यक्तिगत सोच बिल्कुल कुंद हो जाती है. कहानी ‘willing suspension of disbelief’ का एक उत्कृष्ट उदाहरण है.

जब दाम्पत्य जीवन में शक का कीड़ा सर उठाने लगे तो तो उसके परिणाम कितने दुखद हो सकते हैं इसको बहुत मार्मिक रूप से प्रस्तुत करती है कहानी ‘दी परफ़ेक्ट मर्डर’. दाम्पत्य जीवन परस्पर विश्वास के धागे में बंधा होता है और जब यह धागा टूट जाता है तो समय निकल जाने पर पश्चाताप करने के लिए भी अवसर नहीं मिलता. कहानी का प्रस्तुतिकरण बहुत प्रभावी और मर्मस्पर्शी है.

‘मैन इन यूनिफ़ॉर्म’ एक सैनिक के दिल के दर्द की कहानी है जो देश के लिए अपनी जान दे देता है लेकिन कुछ नहीं बदलता न देश में न लोगों की सोच में. सटीक प्रश्न, क्या है एक जवान की शहादत की कीमत, उठाती और अंतस को आंदोलित करती एक सशक्त कहानी.

लेखक की कथानक, चरित्रों, भावों और प्रस्तुतीकरण पर पकड़ बहुत मज़बूत है और किसी भी कहानी का कला या भाव पक्ष कमजोर नहीं पड़ता. लेखक का यह प्रथम कहानी संग्रह है और विश्वास है कि उनकी कलम से ऐसे नायाब उपहार पाठकों को मिलते रहेंगे.

ख़ूबसूरत आवरण और उत्कृष्ट प्रस्तुति के लिए प्रकाशक बधाई के पात्र हैं. १५९ पृष्ठ की पुस्तक का मूल्य है रु.२५० जिसे प्राप्त करने के लिए लेखक से संपर्क किया जा सकता है.

विजय कुमार,
मोबाइल : 09849746500

ईमेल : vksappatti@gmail.com

Tuesday, 15 May 2012

किशोरों में बढ़ती अपराध प्रवृति

समाचार पत्रों में सुबह सुबह हमारे किशोरों की गंभीर अपराधों में शामिल होने की खबरें जब अक्सर देखता हूँ तो पढ़ कर मन क्षुब्ध हो जाता है. कुछ दिन पहले समाचार पत्रों में खबर थी कि चार किशोरों ने कक्षा से १२ साल के लडके को बाहर खींच कर निकाला और चाकुओं से उसे घायल कर दिया. उसका कसूर केवल इतना था कि उसने कुछ दिन पहले अपने साथ पढने वाली मित्र को उनके दुर्व्यवहार से बचाया था. इसी तरह की एक घटना में एक किशोर ने अपने साथी का इस लिये खून कर दिया क्यों कि उसे शक था कि उसने उस पर काला जादू किया है. कुछ समय पहले एक और दिल दहलाने वाली खबर पढ़ी कि एक १५ साल के किशोर ने अपनी पडौस की महिला से ५० रुपये उधार लिये थे और जब उस महिला ने यह बात उसकी माँ को बता दी तो उसे इतना क्रोध आया कि उसने उसके घर जा कर उस महिला पर चाकू से हमला कर दिया और जब उसकी चीख सुन कर पडौस की दो महिलायें बचाने के लिये आयीं तो उसने उन पर भी हमला कर दिया और तीनों महिलाओं की मौत हो गयी. एक छोटी जगह की इसी तरह की एक खबर और पढ़ी थी कि स्कूल से अपने साथी के साथ लौटते हुए एक लडकी को उसके साथ पढने वाले ४,५ साथियों ने रास्ते में रोक कर लडकी के साथ सामूहिक बलात्कार किया. अपने ही साथ पढ़ने वाले साथी का फिरौती के लिये अपहरण और हत्या के कई मामले समाचारों में आये हैं. बलात्कार, लूट, वाहन चोरी, जेब काटना, चोरी करने आदि के समाचार तो बहुत आम हो गये हैं. छोटी उम्र से शराब और ड्रग्स का प्रयोग एक सामान्य शौक बन गया है. आज के किशोरों का व्यवहार देख कर समझ नहीं आता कि इस देश की अगली पीढ़ी का क्या होगा.

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Saturday, 10 March 2012

बुजुर्गों में बढ़ती असुरक्षा की भावना


एक समय था जब बुज़ुर्गों की तुलना घर की छत से की जाती थी जिसके आश्रय में परिवार के सभी सदस्य एक सुरक्षा की भावना महसूस करते थे, लेकिन आज वही छत अपने आप के लिये सुरक्षा की तलाश में भटक रही है. टूटते हुए संयुक्त परिवार, निज स्वार्थ की बढती हुई भावना, शहरों में परिवार के सदस्यों का रोज़गार के लिये पलायन, नैतिक और सामजिक जिम्मेदारियों का अवमूल्यन जैसे अनेक कारण हैं जिनके कारण बुज़ुर्ग आज परिवार में एक अनुपयोगी ‘वस्तु’ बन कर रह गये हैं.

बुजुर्गों में बढती हुई असुरक्षा के अनेक रूप हैं. कुछ बुज़ुर्ग आर्थिक रूप से पूर्णतः समर्थ हैं, लेकिन उनकी भी अनेक समस्याएं हैं. जीवन के अंतिम पड़ाव में उन्हें ज़रूरत है अपनों के प्यार और कुछ समय के साथ की. उनके बच्चों की कुछ मज़बूरियां हो सकती हैं, विशेषकर उनकी जो विदेश में नौकरी और रोज़गार के लिये बस गये हैं. लेकिन कुछ ऐसे परिवार भी हैं जिनके बच्चे उसी शहर, कई बार उसी घर में रहते हैं लेकिन उनके बच्चे पास होते हुए भी दूर होते हैं. उनके पास हर चीज के लिये समय है सिर्फ़ माता पिता से कुछ समय मिलने और बात करने को छोड़ कर. बच्चों का यह व्यवहार अक्सर इन बुजुर्गों की मानसिक पीड़ा का कारण होता है. सब कुछ होते हुए भी अकेलेपन की पीड़ा का दर्द भोगते इन बुजुर्गों की स्तिथि सचमुच शोचनीय है. क्या केवल प्रेम की अपेक्षा करना भी गुनाह है?

लेकिन कुछ बुज़ुर्ग ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने सभी सीमित साधन बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में लगा दिए और अपने भविष्य के लिये कुछ नहीं बचा पाए यह सोच कर कि बच्चे अगर अच्छी तरह स्थापित हो गये तो उन्हें बुढापे में कोई चिंता नहीं होगी. लेकिन बच्चे समर्थ होने पर भी माता पिता को भूल जाएँ और और यह कह कर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड लें कि उनके माता पिता ने जो किया यह उनका फ़र्ज़ था और सभी माता पिता यह करते हैं, तो उन माता पिता के दर्द को आप आसानी से समझ सकते हैं. भारत में सामजिक सुरक्षा की कोई संतोषजनक व्यवस्था न होने के कारण उनका जीवन किस तरह निकलता होगा इस की सहज कल्पना की जा सकती है. यह सही है कि कानून बच्चों को माता पिता की आर्थिक सहायता के लिये बाध्य कर सकता है, लेकिन कितने माता पिता मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से यह कदम उठाने और अदालतों के चक्कर लगाने में समर्थ हैं.

बुजुर्गों का परिवार में उत्पीडन, नौकरों या असामाजिक तत्वों द्वारा उनकी हत्या आदि समाचार लगभग रोज ही पढने  को मिल जाते हैं. आर्थिक रूप से असहाय बुजुर्गों के लिये सामाजिक सुरक्षा की सरकार की ओर से  कोई सार्थक योजना न होने के कारण हालात और भी दुखद हो जाते हैं. जिन्होंने अपने जीवन के स्वर्णिम वर्ष परिवार और समाज के लिये दे दिये क्या उन्हें अपने जीवन का अंतिम समय सुख और शान्ति से जीने का अधिकार नहीं? सरकार द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर बुजुर्गों को जो नाम मात्र की पेंशन दी जाते है क्या उसमें किसी व्यक्ति का गुज़ारा संभव है? जब न तो परिवार और न समाज ही उनकी जिम्मेदारी लेने को तैयार है तो ये बुज़ुर्ग इस उम्र में किस की ओर हाथ बढ़ाएँ? हम ये न भूलें कि सभी को एक दिन इस अवस्था से गुजरना होगा.

बचपन में सुनी एक कहानी याद आती है. एक समृद्ध पारिवार में बुज़ुर्ग पिता के साथ बहुत ही दुर्व्यवहार होता था और उनको खाना भी अलग से पत्तल और मिट्टी के सकोरे में दिया जाता था जिन्हें बाद में फेंक दिया जाता था. उस परिवार में एक छोटा बच्चा रोज यह देखता था. उसने एक दिन वह पत्तल और मिट्टी का सकोरा पानी से धो कर रख दिया जिसे देख कर उसके पिता ने पूछा कि वह ऐसा क्यों कर रहा है. बच्चे ने कहा कि पिता जी जब आप बुड्ढे हो जायेंगे तो आपके लिये भी तो खाना खिलाने को पत्तल और मिट्टी के सकोरे की जरूरत पड़ेगी. नए खरीदने में पैसा खर्च करने की बजाय ये धुले हुए पत्तल सकोरे ही आपके काम आ जायेंगे. बच्चे की बात सुनकर पिता की आँख खुल गयीं और उस दिन से उसका व्यवहार अपने पिता के प्रति बदल गया.

बुजुर्गों की समस्याओं के बारे में आज पारिवार, समाज और सरकार सभी को मिल कर सोचना होगा, वर्ना फ़िर हमें शायद अपनी भूल सुधारने का भी अवसर न मिले और जब हम उस अवस्था को पहुंचें तो और भी बदतर हालातों का सामना करना पड़े.

कैलाश शर्मा

Wednesday, 11 January 2012

भ्रष्टाचार निवारण में परिवार और समाज का योगदान


     भ्रष्टाचार केवल वर्तमान समय की देन नहीं है. यह हरेक युग में किसी न किसी रूप में विद्यमान रहा है, यद्यपि इसका रूप, मात्रा और तरीके समय समय पर बदलते रहे हैं. कौटिल्य ने अपने ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र’ में राज कर्मचारियों द्वारा  सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के तरीकों का विषद वर्णन किया है.
     
     भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार के कार्यक्षेत्र में वृद्धि के साथ, भ्रष्ट आदमियों को ज्यादा मौके मिलने की वजह से, भ्रष्टाचार में भी असाधारण वृद्धि हुई. सरकार ने भ्रष्टाचार का मुकाबला करने के लिये अनेक कानून और संस्थाएं जैसे केन्द्रीय सतर्कता आयोग, सी बी आई, लोकायुक्त, प्रत्येक सार्वजनिक संस्थान में सतर्कता विभाग आदि बनाए, पर बढ़ते हुए भ्रष्टाचार पर कोई अंकुश नहीं लग पाया और आज तो इसका उच्च स्तर पर भी विकराल रूप दिखाई दे रहा है. वर्तमान में लोक पाल बनाने की मांग अन्ना जी के नेतृत्व सारे देश में फ़ैल गयी है.

     इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भ्रष्टाचार को कम करने में कठोर कानून, निष्पक्ष जांच संस्था, न्यायालय में शीघ्र निर्णय आदि महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, लेकिन यह सोचना कि केवल इन उपायों से भ्रष्टाचार मूलतः समाप्त हो जाएगा सिर्फ़ एक दिवास्वप्न होगा. अगर हम समाज से वास्तव में भ्रष्टाचार समाप्त करना चाहते हैं तो हमें अपनी व्यक्तिगत और सामाजिक सोच में भी पूर्णतः बदलाव लाना होगा.

     आज हम जीवन में संतुष्टि की महत्ता भूलते जा रहे हैं. उपभोक्तावाद की आंधी में हम जिस भी नयी चीज का विज्ञापन देखते हैं, तुरंत सोचने लगते हैं कि उसे किस तरह प्राप्त किया जाये. हम अपने जीवन के शुरुआत में ही वह सब चीजें अपने पास चाहते हैं जिनको पाने की हमारी आर्थिक क्षमता नहीं है. पारिवार का वातावरण और सोच इसमें महत्वपूर्ण भाग अदा करती है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हरेक भ्रष्ट व्यक्ति के पीछे एक लालची परिवार होता है. जहां तक सरकारी कर्मचारियों की बात है आज उन्हें जो वेतन मिलता है उसमें वे आराम से जीवन यापन कर सकते हैं, बशर्ते उनके अन्दर संतोष की भावना हो. परिवार के सभी सदस्यों को पता होता है कि परिवार के मुखिया की कितनी आमदनी है और अगर परिवार के सभी सदस्यों के अन्दर यह भावना आ जाये कि इस आय में ही गुजारा करना है, तो भ्रष्ट तरीकों से पैसा कमाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी.
     
     पैसे की कमी भ्रष्टाचार का कारण नहीं है, वर्ना उच्च पदों पर बैठे व्यक्ति भ्रष्टाचार में लिप्त न होते. प्रत्येक की आवश्यकताओं के लिये काफी है, लालच के लिये नहीं. जब परिवार के अन्दर अपने हालातों से संतुष्टि की भावना आ जायेगी, तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध यह एक बहुत बड़ा कदम होगा. इसके लिये आवश्यक है कि परिवार और समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना की जाये और स्कूल से ही नैतिक शिक्षा स्कूल के पाठ्यक्रम का एक हिस्सा हो. अगर हम नयी पीढ़ी में ईमानदारी की भावना पैदा नहीं कर पाए तो परिवार, समाज और देश के लिये उज्वल भविष्य की कामना व्यर्थ है.

     एक समय था जब भ्रष्ट व्यक्ति को समाज में अवांछित समझा जाता था, लेकिन आज उसी व्यक्ति की इज्ज़त की जाती है जिसके पास पैसा है, बिना इस बात पर विचार किये कि यह पैसा उसने कैसे कमाया है और हमारी यह सोच भ्रष्ट व्यक्तियों को महिमामंडित करती रहती है. समाज को इस सोच में बदलाव लाने की आवश्यकता है. हमें नहीं भूलना चाहिए कि भ्रष्टाचार कुछ समय सुख सुविधाएँ दे सकता है, पर यह सदैव छिपा नहीं रह सकता.


     कुछ सामजिक कुरीतियाँ जैसे दहेज़ प्रथा, महंगी होती जा रही शिक्षा व्यवस्था आदि भी भ्रष्टाचार के प्रमुख कारणों में से है, जिन्हें दूर करने के सभी को मिल कर प्रयास करने होंगे.

     जब तक हम खुद ईमानदार नहीं होंगे, तब तक भ्रष्टाचार समाप्त करने की बातें व्यर्थ हैं. रिश्वत दे कर हम तत्काल होने वाली कुछ असुविधाओं को टाल सकते हैं, लेकिन हमारा यह एक कदम दूसरों को सदैव भ्रष्ट बने रहने को प्रेरित करता रहेगा. भ्रटाचार के खिलाफ लड़ाई हर व्यक्ति की लड़ाई है. अगर हम भारत को विकसित और भ्रष्टाचार मुक्त देखना चाहते हैं तो हमें सोचना होगा कि हम इस में व्यक्तिगत और सामाजिक रूप में कितना योगदान दे सकते हैं.

     इस सन्दर्भ में मेरी ये पंक्तियाँ शायद आपको पसन्द आयें :

        भोर सुनहरी करे प्रतीक्षा, सत्य मार्ग के राही की.
       भ्रष्ट न धो पायेगा अपनी लिखी इबारत स्याही की.
              
               कब तक छिपा सकेगी चादर 
               दाग लगा जो दामन में,
               बोओगे तुम यदि अफीम तो
               महके तुलसी क्यों आँगन में.

        भ्रष्ट करो मत अगली पीढ़ी अपने निंद्य कलापों से,
        वरना ताप न सह पाओगे, अपनी आग लगाई की.

               भ्रष्ट व्यक्ति का मूल्य नहीं है
               उसकी केवल कीमत होती.
               चांदी की थाली हो, या सूखी पत्तल,
               सबको खानी होती है,केवल दो रोटी.

        भरलो अपना आज खज़ाना संतुष्टि की दौलत से,
                 कहीं न काला धन ले आये तुमको रात तबाही की.               
                    
कैलाश शर्मा 


Saturday, 10 December 2011

किसकी सुनूँ - इंसानियत या ड़र ?


     २०-२५ साल पहले की घटना है. अपने कार्यालय के कार्य से मुझे गुड़गाँव जाना था. उस समय का गुड़गाँव आज की तरह विकसित नहीं, बल्कि एक छोटा सा शहर था. मैं शिवाजी स्टेड़ियम (दिल्ली) से बस पकड़ कर गुड़गाँव गया और उसी दिन कार्य समाप्त करके शाम को ४ बजे के करीब स्थानीय बस अड्डा पहुंचा. वहाँ मैंने टिकट खिडकी पर विभिन्न स्थानों को जाने वाली बसों के बारे में पढ़ा तो मुझे ‘वजीरपुर’ लिखा दिखाई दिया. मैं दिल्ली में पीतमपुरा में रहता था और वजीरपुर वहां से बिलकुल पास ही था, इसलिये मैंने वजीरपुर का टिकट लिया और बस में बैठ गया. बस के चलने के करीब एक घंटा बाद भी मुझे जब मुझे आसपास कोई आबादी के लक्षणों की बजाय खेत ही दिखाई देते रहे तो मैंने सहयात्री से पूछा कि वजीरपुर अभी कितनी दूर है. जब उसने बताया कि वजीरपुर तो निकल गया, तब मैंने कहा कि अभी तक दिल्ली शहर की आबादी तो आयी ही नहीं. उसने जवाब दिया कि यह बस दिल्ली नहीं जाती बल्कि वजीरपुर गाँव जो हरियाणा में है वहां होकर जाती है. उसने मुझे सुझाव दिया कि अगले बस स्टॉप पर उतर कर, दूसरी बस ले कर वापिस गुड़गाँव जाऊं और वहां से दिल्ली की बस ले लूं. मैं अगले बस स्टॉप पर उतर गया और आसपास बिलकुल सुनसान इलाका दिखाई दिया. दिसंबर का महिना होने के कारण ठण्ड बहुत थी और बिलकुल अंधेरा हो चुका था. बस जिस सड़क पर जा रही थी वह कोई बड़ा हाइवे नहीं था और कोई वाहन भी सड़क पर चलते नहीं दिखायी दे रहे थे. करीब १ किलोमीटर दूर एक छोटे से गाँव की कुछ बत्तियाँ टिमटिमा रहीं थीं. बस स्टॉप पर कोई दुकान वगैरह भी नहीं थी. वहां से गुजरते हुए एक व्यक्ति से पूछने पर पता चला कि ८ बजे के करीब एक बस गुडगाँव के लिये आती है पर उसका आना पक्का नहीं, कई बार वह नहीं भी आती और उसके बाद कोई बस नहीं है. वह मोबाइल फोन या पी सी ओ का जमाना नहीं था और उस सुनसान जगह से कार्यालय या परिवार को सूचित करने का भी कोई साधन नहीं था. जैसे जैसे अँधेरा बढ़ रहा था और इक्का दुक्का लोगों का आना जाना भी कम होता जा रहा था, वैसे वैसे मेरी चिंता बढ़ती जा रही थी.
     
     अचानक गाँव की तरफ से एक कार आती दिखाई दी और जब मैंने उन्हें हाथ दिखाया तो उन्होंने कार रोक दी. पूछने पर उन्होंने बताया कि वे गुड़गाँव जा रहे हैं. यद्यपि कार में पहले से ही चार व्यक्ति बैठे थे, लेकिन जब मैंने उन्हें अपनी समस्या बतलाई तो उन्होंने मुझे कार में बैठ जाने को कहा. मैंने उन्हें गुड़गाँव में कहीं भी उतार देने के लिये कहा लेकिन उन्होंने मुझे बस स्टैंड तक छोड़ा. मैं जल्दी जल्दी में उन्हें ठीक तरह से धन्यवाद भी न दे पाया. लेकिन उनके द्वारा उस समय दी गयी सहायता मैं आज तक नहीं भूल पाया हूँ. इस घटना ने मेरे मन मष्तिष्क पर सदैव के लिये एक अमिट याद छोड़ दी और सोचने लगा कि मैं भी इसी तरह किसी ज़रूरतमन्द की सहायता करके इस अहसान का कुछ अंश चुकाने की कोशिश करूंगा और कुछ वर्षों तक मेरा यह प्रयास भी रहा॰
     
     लेकिन परिस्थितियाँ हमेशा एक सी नहीं रहतीं और आज के हालात के बारे में जब सोचता हूँ तो बहुत दुःख होता है. आजकल, विशेषकर दिल्ली और उसके आसपास, यह समाचार आम हो गये हैं कि किसी व्यक्ति या लड़की ने कार में लिफ्ट माँगी और कार में बैठने पर उस व्यक्ति को लूट लिया या उसकी हत्या कर के गाड़ी ले कर भाग गये. अब तो पुलिस भी अनजान आदमी को लिफ्ट न देने की सलाह देती है. ऐसे हालात में सच में मुसीबत में फंसे व्यक्ति को भी हम चाहते हुए सहायता नहीं कर पाते, क्योंकि सच और झूठ का अंतर करना बहुत मुश्किल हो जाता है.
     
     आज श्री सुदर्शन जी की प्रसिद्ध कहानी ‘हार की जीत’ जो स्कूल में पढ़ी थी याद आती है, जिसमें बाबा भारती का प्रिय घोड़ा जब डाकू खड़ग सिंह धोके से अपाहिज बनकर ले जाता है तो वे उससे कहते हैं कि यह बात किसी को बताना नहीं क्यों कि लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन दुखियों पर विश्वास नहीं करेंगे. इस बात पर एक डाकू का ह्रदय भी बदल जाता है. कहानी का सन्देश कितना सटीक और सच था, इसे आज हम अपनी आँखों से देख रहे हैं. जो व्यक्ति आप से सहायता मांग रहा है, वह हो सकता है सच में किसी परेशानी में हो, लेकिन जब दिन प्रति दिन कार में लिफ्ट मांग कर बदमाशों द्वारा लूटे जाने की घटनाएँ पढते हैं तो मन एक अनिश्चय की स्तिथि में आ जाता है और अधिकांशतः हम अपनी आँख मूँद लेना ही बेहतर समझते हैं. आज के लुटेरों से खड़ग सिंह की तरह संवेदनशीलता की आशा व्यर्थ है.
     
     जब भी किसी को, विशेष कर रात्रि के समय, सड़क पर लिफ्ट माँगने के लिये हाथ उठाते देखता हूँ, तो हर बार मुझे दी गयी सहायता की घटना आँखों के सामने आ जाती है और पैर स्वतः ब्रेक पेडल पर पड़ने को तत्पर हो जाते हैं, लेकिन मन की आवाज को दबा कर मैं बिना उस ओर ध्यान दिए तेजी से आगे निकल जाता हूँ, यद्यपि रास्ते भर मुझे उसकी सहायता न करने का अफ़सोस रहता है और सोचने लगता हूँ कि अगर मुझे भी उस समय लिफ्ट नहीं मिली होती तो मैं कितनी बड़ी परेशानी में फंस जाता. आप ही बतायें कि क्या मैं गलत हूँ ?

Tuesday, 22 November 2011

हमारी सम्वेदना और सहनशीलता क्यों मर रही हैं ?


     बचपन से हमें सिखाया जाता रहा है कि संवेदनशीलता और सहनशीलता सफल जीवन के मूल मन्त्र हैं. हमारे सभी प्राचीन ग्रन्थ और सभी धर्म सहनशीलता और सहअस्तित्व का महत्व बताते रहे हैं. लेकिन आज हम जब अपने चारों ओर नज़र डालते हैं तो देखते हैं कि हम अपने व्यक्तिगत, सामाजिक और धार्मिक जीवन में कितने असंवेदनशील और असहिष्णु होते जा रहे हैं.
     
     सड़क पर गाड़ी को ओवर टेक करने के लिये जगह न देने पर दूसरी कार के ड्राईवर से झगडा करना और फिर गोली मार देना, दो गाड़ियों का हलके से छू जाने पर भी गाली गलौज और फिर एक दूसरे पर हथियारों से हमला, ये समाचार आजकल लगभग प्रतिदिन पढने को मिल जाते हैं. एक दो दिन पहले ही समाचार पत्र में था कि एक व्यक्ति की गाड़ी से दूसरे व्यक्ति की गाड़ी को मोडते समय कुछ खरोंच लग गयी तो उसने अगले चौराहे पर उस पर गोली चला दीं और एक गोली उसके ज़बडे में लगी और उसकी हालत चिंता जनक है. दूसरी घटना में एक चालक द्वारा गाड़ी पीछे करते हुए उसकी गाड़ी दूसरी गाड़ी के बम्पर से टकरा गयी और इसके बाद झगड़ा बढने पर एक व्यक्ति ने हवा में गोलियाँ चला दीं. आज से २० साल पहले सड़क पर गाड़ी चलाते समय दूसरे व्यक्तियों के अधिकारों के प्रति सहनशीलता और सौहार्द्य का भाव और यातायात नियमों का पालन करना प्रत्येक व्यक्ति की एक स्वाभाविक प्रवृति थी और road rage जैसे शब्दों से शायद सभी अनजान थे. यह सही है कि आज वाहनों की संख्या बढने से सडकों पर वाहनों की भीड़ ज्यादा हो गयी है, लेकिन बढती हुई दुर्घटनाओं और road rage का केवल यही कारण नहीं है. आज तो बुजुर्ग और शरीफ़ आदमियों को इस तरह की घटनाओं को देख कर दिल्ली में सड़क पर गाड़ी चलाते हुए हर समय एक भय और आशंका बनी रहती है.

     सड़क पर अगर दुर्घटना में घायल व्यक्ति तड़प रहा हो तो उसे देखने तमाशबीनों की भीड़ तुरंत लग जाती है. दो पहिया वाहन चालक अपना वाहन एक तरफ रोक कर उसे देखते हैं और कुछ देर में अपने रास्ते चल देते हैं. कारें पास से दौडती हुई चली जाती हैं और किसी में यह इंसानियत का भाव पैदा नहीं होता कि रुक कर उसे अस्पताल पहुंचा दें. समय का अभाव, गाड़ी का गंदा हो जाने या पुलिस के चक्करों में पडने का डर ऐसे प्रश्न नहीं जिनका ज़वाब एक व्यक्ति की ज़िंदगी से ज्यादा हो. एक घायल व्यक्ति समय पर चिकित्सा न मिलने से अधिकांशतः सड़क पर दम तोड़ देता है और हमारी संवेदनशीलता भी उसी के साथ मर जाती है.
     
     पहले आस पडौस एक बड़े परिवार की तरह माना जाता था. बुजुर्गों की इज्ज़त और छोटों से स्नेह एक आम बात थी. सभी एक दूसरे के दुःख सुख में शामिल होने को सदैव तैयार रहते थे. कितना अच्छा लगता था जब पत्येक व्यक्ति को एक रिश्ते से संबोधित किया जाता था. लेकिन आज महानगरों में पडौस के व्यक्ति के बारे में जानना तो बहुत बड़ी बात है, पडौस में कोई मकान या फ्लैट नंबर किधर पड़ेगा यह तक नहीं बता पाते. सभी एक दूसरे से अनजान अपनी अपनी दुनियां में जी रहे हैं. किसी को एक दूसरे के सुख दुःख का कुछ पता नहीं. कुछ समय पहले दिल्ली में दो बहनों की महीनों घर में भूखे और बीमार होने पर भी पडौस में किसी को कुछ पता न होना हमारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है. इस प्रेम और सहनशीलता के अभाव में छोटी छोटी बातों पर झगड़ा होना भी एक आम बात है.

     पडौस की बात तो बहुत दूर, एक परिवार में भी हम एक दूसरे की भावनाओं से कितने अनजान हो गये हैं. सभी अपनी ज़िंदगी स्वतंत्र रूप से जीना चाहते हैं जिसमें परिवार के अन्य संबंधों का कोई स्थान नहीं है. आज के परिवार के बुज़ुर्ग आर्थिक रूप से स्वतंत्र होते हुए भी अपने आप को कितना अवांछित, तिरस्कृत और अकेला पाते हैं. उन्हें केवल प्यार और सम्मान की ज़रूरत है और आज की पीढ़ी उन्हें इतना भी देने को तैयार नहीं. जो बुज़ुर्ग आर्थिक रूप से बच्चों पर निर्भर हैं उनके बारे में तो कल्पना करके ही रूह काँप उठती है. पति पत्नी के संबंधों में असहनशीलता और असंवेदनशीलता उनके बीच बढ़ते हुए तनाव और तलाक का एक प्रमुख कारण बनती जा रही है. हम जितने ज्यादा शिक्षित और समृद्ध होते जा रहे हैं उतने ही अपने संबंधों के प्रति असंवेदनशील और असहिष्णु होते जा रहे हैं. 


     इस बढती हुई असंवेदनशीलता और असहिष्णुता के अनेक कारण हैं, जिनको हम जानते हुए भी अनजान बन रहे हैं. संयुक्त परिवारों के टूटते जाने के कारण आज हमारे बच्चे नैतिक मूल्यों से वंचित होते जा रहे हैं. बाल दिवस के अवसर पर एक कार्यक्रम देख रहा था जिसमें एक बच्ची से पूछा गया कि उसे कौन सा विषय सबसे खराब लगता है तो उसका ज़वाब था Moral Studies (नैतिक शिक्षा). जिस समाज में बच्चों की शुरू से यह सोच हो, उस समाज के भविष्य का स्वतः अनुमान लगाया जा सकता है. माता पिता अपने कार्यों में व्यस्त रहने की वजह से बच्चों के चारित्रिक विकास की ओर कोई ध्यान दे नहीं पाते, और बच्चे कार्टून और टीवी से जुड कर रह जाते हैं.

     आज समाज में किसी व्यक्ति का स्थान उसके ज्ञान, चरित्र से नहीं, बल्कि धन और पद के आधार पर मूल्यांकित किया जाता है, चाहे वह उसने किसी भी गलत ढंग से प्राप्त किया हो. नव-धनाड्यों का क़ानून और नियमों के प्रति अनादर और यह सोच कि पैसे से सब कुछ कराया जा सकता है, राजनीती का गिरता हुआ स्तर और कानून व्यवस्था में उनका बढता हुआ हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार और लचर कानून आदि ने दूसरों के अधिकारों के प्रति असहनशीलता और असंवेदनशीलता को बढ़ावा देने में बहुत बड़ा योगदान दिया है. किसी भी तरह पैसा कमाने की भागदौड ने आज व्यक्ति की संवेदनशीलता को कुचल दिया है.

     आज हम भौतिक सुविधाएँ और धन कमाने के चक्कर में अपनी संस्कृति और संस्कारों को भूलते जा रहे हैं और पता नहीं यह हमारी अगली पीढ़ी और समाज को कहाँ ले जाएगा. पंकज उधास की गायी हुई एक बहुत मर्मस्पर्शी गज़ल ‘दुःख सुख था एक सबका’ तीन पीढ़ियों की सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था और सम्वेदनाओं की बदलती हुई स्तिथि का बहुत सटीक और मर्मस्पर्शी चित्रण करती है. आज की अवस्था का चित्रण करती ये पंक्तियाँ दिल को छू जाती हैं :
       अब मेरा दौर है ये, कोई नहीं किसी का.
       हर आदमी अकेला, हर चेहरा अज़नबी सा.
       
       आंसू न मुस्कराहट, जीवन का हाल ऐसा,
       अपनी खबर नहीं है, माया का जाल ऐसा.
       
       पैसा है, मर्तबा है, इज्ज़त बिकार भी है,
       नौकर है और चाकर, बंगला है कार भी है.
       
       ज़र पास है, ज़मीं है, लेकिन सुकूं नहीं है,
       पाने के वास्ते कुछ, क्या क्या पड़ा गंवाना.