Tuesday, 25 August 2015

क्या सदैव सत्य बोला जा सकता है?

क्या मैं सदैव सत्य बोलता हूँ? बोल पाता हूँ? क्यूँ ? एक ऐसा प्रश्न जिसका उत्तर आसान भी है और बहुत कठिन भी. बहुत आसान है यह कहना कि जिसे मेरा मन या अंतरात्मा सच मानता है उसे मैं बिना किसी भय या परिणाम की चिंता किये स्पष्ट कह देता हूँ, क्यूँ कि ऐसा करने से मेरे मन को संतुष्टि मिलती है. लेकिन क्या यह सत्य जिसे मेरा मन सत्य मानता है, वास्तव में सम्पूर्ण और सार्वभौमिक सत्य है? क्या मेरी अंतरात्मा इतनी निर्मल और निर्पेक्ष है कि वह सत्य का मूल्यांकन कर सकती है? क्या मेरी शिक्षा, संस्कार, ज्ञान-संचय, आसपास के वातावरण, जीवन अनुभवों आदि ने मेरी आत्मा को अपने आवरण से नहीं ढक रखा है, जिससे मेरा सत्य का मूल्यांकन व्यक्तिगत, सापेक्ष हो गया है और इसको मैं शाश्वत सत्य कैसे मन लूँ? फिर मैं कैसे कैसे कह दूँ कि मैं हमेशा सत्य बोलता हूँ.

सत्य क्या है एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर बहुत कठिन है. मैं जो आँखों से देखता हूँ, कानों से सुनता हूँ वह केवल मेरा सापेक्ष, व्यक्तिगत, अर्ध सत्य है. मैंने जो देखा है उससे परे भी उस घटना के पीछे कोई सत्य छुपा हो सकता है जिससे मैं अनभिज्ञ हूँ. इस लिए मेरा देखा सुना सत्य कैसे सम्पूर्ण, सार्वभौमिक सत्य हो सकता है? हम वस्तुओं और घटनाओं को उस तरह नहीं देखते जैसी वे हैं, बल्कि उस तरह जैसा हम देखना चाहते हैं. प्रश्न उठता है कि सत्य क्या है. भारतीय दर्शन के अनुसार ब्रह्म ही परम सत्य है जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता. अपनी आत्मा को उस परम आत्मा से आत्मसात करके और उसमें स्वयं को समाहित करके ही उस निर्पेक्ष परम सत्य का अनुभव कर सकते हैं. लेकिन इस सत्य का दर्शन और पालन एक साधारण व्यक्ति के लिए संभव नहीं है. महात्मा गाँधी ने कहा था सत्य की खोज के साधन जितने कठिन हैं, उतने ही आसान भी हैं। अहंकारी व्यक्ति को वे काफी कठिन लग सकते हैं और अबोध शिशु को पर्याप्त सरल।

हमें बचपन से सिखाया जाता है "सत्यम् ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यम् अप्रियं", लेकिन सत्य अधिकांशतः कड़वा होता है और अगर उसे प्रिय बनाना पड़े तो फिर वह सत्य कहाँ रहेगा, अधिक से अधिक उसे चासनी में पगा अर्ध सत्य कह सकते हैं. अगर सत्य अप्रिय है तो उसे न कहना क्या सत्य का गला घोटना नहीं है? अप्रिय सत्य कहने के स्थान पर अगर मौन का दामन थाम लिया जाय तो क्या यह असत्य का साथ देना नहीं होगा? ऐसे हालात में क्या किया जाए? आज के समय जब चारों ओर स्वार्थ और असत्य का राज्य है, कैसे एक व्यक्ति केवल सत्य के सहारे जीवन में आगे बढ़ सकता है? लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कुछ पल की खुशी के लिए असत्य को अपना लिया जाये. सत्य बोलना आसान है क्यों कि आपको याद नहीं रखना होता कि आपने पहले क्या कहा था, लेकिन एक बार झूठ बोलने पर उस झूठ को छुपाने के लिए न जाने कितने झूठ बोलने पड़ते हैं.

अपने व्यक्तिगत और कार्य क्षेत्र पर जब दृष्टिपात करता हूँ तो मेरे लिए यह कहना बहुत कठिन होगा कि मैंने सदैव सत्य ही बोला या नहीं, लेकिन इतना अवश्य कहूँगा कि मैंने अपने कार्यों और निर्णयों में निस्संकोच और बिना किसी डर के वही निर्णय लिया जो मेरी अंतरात्मा ने तथ्यों के आधार पर सही माना और अपने आप को और अपनी अंतरात्मा को कभी धोखा नहीं दिया. अपने व्यक्तिगत और कार्य क्षेत्र में सदैव कोशिश की कि ऐसा कोई कार्य न करूँ जिसे मेरी आत्मा सही स्वीकार नहीं करती. किसी को अपने शब्दों से चोट न पहुंचे इस लिए कई बार सत्य कहने की बजाय मौन का दामन थाम लिया. किसी को कुछ पल की खुशी देने के लिए असत्य का सहारा लेना मेरे लिये संभव नहीं, और न ही ऐसे अप्रिय सत्य को कहना जिससे किसी को दुःख पहुंचे. यह मेरा सत्य है और यह सत्य है या असत्य इसका निर्णय मैं भविष्य पर छोड़ता हूँ. सार्वभौमिक और शाश्वत सत्य की मंजिल अभी बहुत दूर है और जब सब अपने अपने सत्य के साथ जी रहे हैं, ऐसे हालात में मैं कैसे कहूँ कि सदैव सत्य बोला जा सकता है.


....©कैलाश शर्मा 

Tuesday, 14 April 2015

एक सिक्का, दो पहलू (लघु-कथा)

अप्रैल माह रविवार की एक भीगी भीगी सी सुबह थी. खिड़की से बाहर झांकती सुमन बोली ‘रमेश, बाहर देखो कितना सुहावना मौसम है. रात भर ओले और तेज बारिस के बाद बाहर कितना अच्छा मौसम हो गया है. बहुत दिन हो गए गर्मी में घर में बैठे बैठे. चलिए कहीं पिकनिक पर चलते हैं बच्चों के साथ.’

‘ठीक है सुमन. तुम बच्चों को भी तैयार कर लो. पहले लम्बी ड्राइव पर चलेंगे और किसी रिसोर्ट में लंच करेंगे.’ बिस्तर से उठते हुए रमेश बोला.

‘जी, आज सारा दिन बाहर ही गुजारेंगे और रात को पिक्चर देख कर और बाहर ही खाना खा कर आयेंगे.’ सुमन ने रमेश के गले लगते हुए कहा और गुनगुनाते हुए कमरे से बाहर निकल गयी.
                 *****
रात भर तेज बारिस और कड़कती बिजली का शोर श्यामू के मन को दहलाता रहा. खपरैल की छत पर ओलों के गिरने की तीव्र आवाज़ सर पर पत्थर की चोट जैसी लग रह थी. रात भर वह अप्रैल के महीने में बे-मौसम बरसात और खेतों में खड़ी फसल के बारे में सोच कर सो नहीं पाया. कई बार खेतों में जाने की सोचा, लेकिन बारिस की तीव्रता को देख कर वह मन मसोस कर रह गया. सुबह उठते ही बाहर आकर देखा तो बादल साफ़ थे और वह पत्नी की नास्ते के लिए आवाज़ अनसुनी करके खेतों की ओर भागा. ओले और तेज बारिस से नीचे जमीन पर पड़े गेहूँ की बालियों को देख कर उसकी आँखें फटी की फटी रह गयीं. अपने खेत में गेहूँ की कल तक लहलहाती बालियों को आज जमीन पर गिरी देख उसकी आँखों के सामने साहूकार, भूखे बच्चों और शादी के योग्य बेटी कमला की सूरत तैरने लगी. बेमौसम बरसात से अपने सपनों को जमीन पर कुचला पड़ा देख उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया और वह अपने सीने को पकड़ कर जमीन में लेटी हुई गेहूँ की बालियों पर बेजान हो गिर पड़ा. उसकी खुली आँखें एकटक खोज रहीं थीं आसमान के गर्भ में छुपे बेमौसम काले बादलों को.   

...कैलाश शर्मा                     

Wednesday, 30 July 2014

नारी सम्मान और हम

जब दामिनी के साथ घटे वीभत्स कृत्य पर सारा देश आक्रोश से उबला तो एक आशा जगी थी कि देश में स्त्रियों के प्रति हो रहे अपराधों के प्रति व्यवस्था और जनता जागरूक होगी और इन अपराधों में कमी आयेगी. लेकिन क़ानून में बदलाव और सुधार के बाद भी आज भी प्रतिदिन इन घटनाओं में कोई कमी नहीं दिखाई दे रही. जनता की जागरूकता, कड़े कानून, शीघ्र अदालती निर्णयों की व्यवस्था और पुलिस की सतर्कता के वाबजूद लगता है इन वहशियों को कोई डर नहीं, वर्ना इस आक्रोश और बदलाव का कुछ तो असर इन पर होता.

सबसे दुखद और चिंता की बात तो यह है कि आजकल बलात्कार और अन्य अपराधों में लिप्त होने में किशोरों की संख्या बढ़ती जा रही है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के द्वारा जारी २०१३ के आंकड़ों के अनुसार २०१३ में बलात्कार के अपराधों में किशोर अपराधियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई और अपराधों में लिप्त अधिकांश किशोरों की उम्र १६ से १८ के बीच थी. प्रतिदिन समाचार पत्र इस तरह की खबरों से अब भी भरे रहते हैं.

आवश्यकता है विचार करने की कि स्त्रियों के प्रति हो रहे विभिन्न अपराधों का मूल कारण क्या है. क्यों समाज में आक्रोश और कठोर दंड व्यवस्था के होने पर भी बलात्कार और स्त्रियों के प्रति अपराधों में कोई कमी नहीं आ रही? क्यों लड़कियां घर के अन्दर या बाहर अपने आप को सुरक्षित महसूस नहीं करतीं? स्त्रियों के प्रति अपराधों में पुलिस और व्यवस्था की सतर्कता एवं त्वरित और कठोर न्याय व्यवस्था अपनी जगह ज़रूरी है, लेकिन केवल इनके भय से ही ये अपराध नहीं रोके जा सकते. आवश्यकता है आज हमारे समाज को स्त्रियों के प्रति अपनी सोच पर पुनर्विचार करने की.

हमारे पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों को एक दोयम दर्ज़े का नागरिक समझा जाता है. अधिकांश घरों में पुरुष ही प्रधान है और उसका सही या गलत निर्णय ही सर्वोपरि होता है, जिसका विरोध करने का अधिकार स्त्रियों को नहीं होता. जिन परिवारों में महिलाएं आर्थिक रूप से समर्थ हैं वहां भी उन्हें बराबर का दर्ज़ा नहीं मिलता और प्रमुख पारिवारिक निर्णयों में उनकी राय को कोई महत्व नहीं दिया जाता. यह परंपरा परिवार में आगे चलती रहती है. हमारे परिवारों में आज भी बेटे को बेटी से अधिक महत्व दिया जाता है. बेटे की हर इच्छा पहले पूरी की जाती है और उसकी गलतियों को भी यह कह कर नज़रंदाज़ कर दिया जाता है कि लड़का है बड़ा होकर सब ठीक हो जाएगा. दूसरी ओर बेटियों को हमेशा यह याद दिलाया जाता है कि उन्हें दूसरे घर में जाना है और उन्हें ऐसा कोई कार्य नहीं करना है जिससे घर की बदनामी हो और उनके प्रत्येक कार्य पर निगरानी रखी जाती है. परिवार का लड़का जब इस वातावरण में बड़ा होता है तो उसके मष्तिष्क में यह बात मज़बूत होने लगती है कि वह विशेष है. जिस तरह पिता घर में प्रमुख है और उनकी गलतियों पर कोई उंगली नहीं उठा सकता, उसी तरह वह भी लड़का है और उसकी सभी गलतियाँ क्षम्य हैं.

जब लड़का पिता को घर में शराब पीकर बच्चों के सामने माँ को पीटता हुआ देखता है और माँ के समर्थन में परिवार का कोई सदस्य नहीं खड़ा होता तो लड़के के मष्तिष्क में यह बात बैठने लगती है कि पिता जो कर रहा है वह स्वाभाविक है और यह उसका पुरुष होने का अधिकार है और जब वह बड़ा होने लगता है तो उन्ही पद चिन्हों पर चलने लगता है. प्रत्येक लड़की उसके लिए सिर्फ़ एक वस्तु बन कर रह जाती है जिसका उपयोग करना वह अपना अधिकार समझने लगता है. लड़कियों की इज्ज़त और सम्मान करना एवं उनसे एक स्वस्थ सम्बन्ध रखना उसके लिए एक अनज़ान सोच होती है. इस सोच के चलते छोटी उम्र में ही लड़कियों के साथ छेड़ छाड़ और दुर्व्यवहार उसको स्वाभाविक लगते हैं और उसके मन में अपराध बोध की कोई भावना नहीं जगती और यही कारण है कि आजकल स्त्रियों के प्रति दुर्व्यवहार के केसों में किशोरों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है.

केवल कठोर क़ानून या दंड व्यवस्था से इस समस्या का स्थायी हल संभव नहीं. परिवार समाज की वह इकाई है जहाँ बच्चों में संस्कार व आचरण की नींव पड़ती है. अगर हमें अपनी अगली पीढ़ी और बच्चों को अपराधों की दुनिया से दूर रखना है तो इसकी शुरुआत हमें पहले अपने घरों से करनी होगी. जरूरी है हमें स्त्रियों के प्रति अपनी सोच और व्यवहार बदलने की. अगर हम हम स्वयं घर की स्त्रियों माँ, पत्नी, बेटी को उनका सम्मान और हक़ देने लगें तो घर के बच्चों पर भी इसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा और बचपन से ही वह माँ, बहन एवं अन्य लड़कियों के प्रति इज्ज़त और सम्मान का भाव रखने लगेंगे. अगर घर में स्वस्थ और खुशहाल वातावरण है तो निश्चय ही इसका प्रभाव बच्चों पर भी पड़ेगा और वे एक स्वस्थ सोच के साथ जीवन में आगे बढ़ेंगे.

संयुक्त परिवारों में घर के बुज़ुर्ग बच्चों को सही आचरण की शिक्षा के द्वारा उनको सही रास्ते पर चलने में मार्गदर्शन करते थे. लेकिन संयुक्त परिवारों के बढ़ते हुए विघटन के बाद आज माता पिता को अपनी अपनी व्यस्तताओं के चलते हुए बच्चों के साथ सार्थक समय व्यतीत करने का समय नहीं होता और अधिकांश परिवारों में बच्चों को व्यस्त रखने के लिए छोटे बच्चों के हाथों में ही मोबाइल और लैपटॉप पकड़ा देते हैं जिनमें वे अपनी पसंद के खेलों में व्यस्त रहते हैं और वे यह भी नहीं देखते कि बच्चे क्या देख रहे हैं, क्या खेल रहे हैं. उनको सद आचरण, संस्कारों के बारे में बताने के लिए समय देने का तो प्रश्न ही नहीं उठता.

इस तरह के वातावरण में पले बच्चे, नियंत्रण एवं मार्गदर्शन के अभाव में, जब घर से बाहर किसी गलत संगत में पड जाते हैं तो बहुत शीघ्र गलत संगत से प्रभावित हो जाते हैं. यहीं से प्रारंभ हो जाता है उनका पहला कदम अपराध की दुनिया में और सही मार्ग दर्शन के अभाव में बड़े अपराधों की दुनिया में कदम रखने में देर नहीं लगती.

अगर हमें अपनी युवा पीढ़ी को अपराध की दुनिया से बचाना है तो उनके सुखद भविष्य के लिए इसकी शुरुआत हमें सबसे पहले अपने घर से ही करनी होगी. हमें स्वयं घर में माँ, पत्नी, बहन, बेटी आदि को उचित सम्मान दे कर बच्चों के सामने एक सार्थक उदाहरण रखना होगा जिस पर वह आगे चल सकें. लड़के और लड़कियों को समान प्यार, सम्मान और मार्ग दर्शन देना होगा. केवल क़ानून व्यवस्था को दोष देने से काम नहीं चलेगा, इसकी शुरुआत हमें स्वयं अपने घर से करनी होगी.

...कैलाश शर्मा


Friday, 18 April 2014

“परछाइयों के उजाले” – आईना ज़िंदगी का

कविता वर्मा जी के कहानी लेखन से पहले से ही परिचय है और उनकी लिखी कहानियां सदैव प्रभावित करती रही हैं. उनका पहला कहानी संग्रह “परछाइयों के उजाले” हाथ में आने पर बहुत खुशी हुई. पुस्तक को एक बार पढ़ना शुरू किया तो प्रत्येक कहानी अपने साथ भावों की सरिता में बहा कर ले गयी. ज़मीन से जुड़ी कहानियों के कथ्य, पात्र और भाव अपने से लगते हैं और अहसास होता है कि जैसे अपने घर आँगन में पसरे हुए हालात, कमरे की खिड़की से झांकते हुए आस पडौस की दुनियां को देख रहे हैं. जीवन के विभिन्न आयाम कहीं नारी मन की व्यथा, अंतर्द्वंद और उसका आत्म-विश्वास, कहीं रिश्तों के दंश तो कहीं प्रेम के विभिन्न अहसास कहानियों में प्रखरता से उभर कर आये हैं. समाज के अभिजात्य, मध्यम एवं पिछड़े वर्गों की वेदना और मज़बूरी को लेखिका ने बहुत प्रभावी ढंग से रेखांकित किया है. कहानियों का कथ्य व शैली किसी भी वाद से परे है और कहानियां केवल कहानियां हैं – जीवन के यथार्थ का दर्पण - और यही विशेषता पाठक को कहानियों से अंत तक बांधे रखती है. कहानियों का शिल्प व भाषा सहज और सरल है और अंत तक रोचकता बनाये रखने में सक्षम है.

‘एक नयी शुरुवात’ की स्नेह और ‘जीवट’ की फुलवा आत्म-विश्वास से परिपूर्ण ऐसी नायिका हैं जो किसी भी हालात का जीवट से सामना कर सकती हैं. समृद्ध परिवार की स्नेह एक तरफ़ अपनी भावनाओं और प्रेम के लिए अपने परिवार से संघर्ष को तैयार हो जाती है वहीँ वह एक व्यावहारिक सोच का सहारा लेकर ऐसा निर्णय लेती है जो उसके जीवन की दिशा ही बदल देता है. फुलवा एक  गरीब पिछड़े वर्ग की एक प्रतिनिधि पात्र है जो स्वयं मेहनत मज़दूरी कर के घर का खर्चा चलाती है लेकिन जब उसके स्वाभिमान और ममता को चोट लगती है तो वह एक निर्णय लेती है ‘मुझे किसी के सहारे की क्या जरूरत है औरत हूँ तो क्या?’. यही आत्म-विश्वास और व्यावहारिकता ही दोनों कहानियों का सशक्त पक्ष है.

कितना आसान होता है रिश्तों को सगों और सौतेलों की परिभाषाओं से बाँट देना. सम्पत्ति के बंटवारे की आशंका से स्नेह के रिश्तों पर भी सौतेलेपन की धूल जमने लगती है और निस्वार्थ स्नेह को भी आशंका की दृष्टि से देखा जाने लगता है. संपत्ति के लालच में सौतेले संबंधों के स्नेह पर संदेह करना जब कि अपना खून भी आज कल संपत्ति के लालच से परे नहीं है , इन्ही सब प्रश्नों से जूझती कहानी ‘सगा सौतेला’ आज के बदलते रिश्तों की सच्चाई को बहुत संवेदनशीलता से चित्रित करती है.

व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए किस तरह एक गरीब की मज़बूरी और परेशानियों का किस हद तक भावनात्मक शोषण कर सकता है इसकी प्रभावी अभिव्यक्ति है कहानी ‘निश्चय’. मालकिन रेनू के अहसानों से दबी मंगला के सामने जब उसकी सहायता के पीछे रेनू का स्वार्थ और दोगलापन स्पष्ट हो जाता है तो वह निश्चय लेने में एक पल की देर नहीं करती. समाज में व्याप्त स्वार्थ और दोगलेपन को लेखिका ने इस कहानी में बहुत गहराई से रेखांकित किया है.

‘पुकार’ एक ऐसी भावपूर्ण कहानी है जिसका प्रस्तुतिकरण इतना स्वाभाविक और सहज है कि लगता नहीं कि आप कोई कहानी पढ़ रहे हैं. एक एक शब्द भावों का समंदर है. कहानी का अंत अन्दर तक झकझोर देता है.

अगर एक माँ एक बच्चे को पीटती है तो यह उसका अधिकार समझा जाता है, लेकिन एक निस्संतान स्त्री अगर उस बच्चे को जिसे वह अपने पुत्र की तरह पालती है और उसमें अच्छी आदतें डालने के लिए सख्ती करती है तो उसे अत्याचार समझा जाता है और सभी उंगलियाँ उसकी ओर उठने लगती हैं. एक निस्संतान स्त्री का दर्द ‘लकीर’ कहानी में बहुत शिद्दत और मार्मिकता से उभर कर आया है.

पुरुष प्रधान समाज में विशेषकर ग्रामीण परिवेश में जब स्त्री पर घर के सदस्य की ही कुदृष्टि हो उस स्त्री की मनोदशा को ‘आवरण’ कहानी में बड़े प्रभावी ढंग से उकेरा है. एक असहाय स्त्री को जब एक दूसरी असहाय सी प्रतीत होने वाली जेठानी का सहारा मिल जाता है तो वह हरेक हालात से मुकाबला करने को खड़ी हो जाती है. सुकुमा और उसकी जेठानी का चरित्र चित्रण कहानी का एक सशक्त पक्ष है.

‘एक खालीपन की नायिका’ माया एक आज की नारी है जिसने अपनी माँ को सदैव पिता के डर के तले जीते देखा. लेकिन माया की सोच है ‘क्यों किसी के लिए जिए जिन्दगी? क्या मिलेगा इस तरह अपनी जिन्दगी किसी और के पास गिरवी रख कर?’ नारी का स्वाभिमान पुरुष के अहम् को सहन नहीं होता और वह चाहता है कि नारी अपना अस्तित्व भूल कर उसके अहम् को पोषित करे. माया को यह स्वीकार नहीं कि वह किसी के अहम् को संतुष्ट करते करते खुद चुक जाए, अकेलेपन के ‘खालीपन में कम से कम वह खुद के साथ तो है.’ माया के मानसिक द्वन्द को कहानी में बहुत ही प्रभावी ढंग से उकेरा गया है. यह कहानी केवल माया की कहानी नहीं बल्कि प्रत्येक उस नारी के मानसिक संघर्ष की कहानी है जो अपने अस्तित्व और स्वाभिमान को किसी के पैरों तले कुचलता नहीं देख सकती.

परिवार में या समाज में जब कमजोर व्यक्ति आगे बढ़ने और अपना अस्तित्व व वर्चस्व बनाने की कोशिश करता है तो परिवार के सदस्यों या समाज के चौधरियों को अपनी स्थापित प्रतिष्ठा डगमगाती दिखाई देने लगती है और फिर होता है प्रयत्न उसको नीचा दिखाने का. ‘दलित ग्रंथी’ कहानी में इसी संघर्ष को बहुत प्रभावी रूप में उजागर किया है. कहानी के चरित्र अपने से और जीवंत लगते हैं और यही कहानी का सबसे बड़ा आकर्षण है.

‘डर’ और ‘पहचान’ ऐसी समसामयिक कहानियां हैं जो बिल्कुल स्वाभाविक और विश्वसनीय लगती हैं. जब नारी को अपनों के द्वारा ही छला जाये तो वह अपने आप को कितनी कमजोर और लाचार पाती है, लेकिन अगर उसे सही समय पर सहारा और मार्गदर्शन मिल जाए तो वह किसी भी मुसीबत का सामना कर सकती है. ‘डर’ की नायिका को जब आंटी जी का सहारा मिल जाता है तो वह सब डर भूल कर परिस्थितियों का सामना करने को तैयार हो जाती है. ‘पहचान’ की वेदिका पति की मृत्यु के बाद जब अपने आप को अपनों के बीच अजनबी पाती है और टूट जाती है तो राधिका और आशा उसका हाथ पकड़ कर उसे सहारा देती हैं और उनके सहारे और अपने साहस से वह अपनी एक ऐसी पहचान बना पाती है जिसके सामने सब नत मस्तक हो जाते हैं. दोनों कहानियां अंतस को गहराई तक छू जाती हैं.

‘परछाइयों के उजाले’ स्त्री मन की भावनाओं को समझने का एक बहुत गहन प्रयास है. स्त्री पुरुष के बीच केवल शारीरिक संबंध ही नहीं होता, उनके बीच दोस्ती का भावनात्मक लगाव भी हो सकता है, लेकिन इसे समाज सदैव शक़ की नज़रों से देखता है. उम्र के ढलते पड़ाव में भी किसी पर-पुरुष के सानिध्य में भावनात्मक ख़ुशी का अहसास करने में भी समाज का डर नारी जीवन का एक ऐसा दर्द है जिसे कहानी में बहुत ही संवेदनशीलता से उकेरा है.

जीवन के इर्द गिर्द घूमती कहानियां पाठक को अंत तक अपने साथ बांधे रखती हैं. एक पठनीय और संग्रहणीय कहानी संग्रह के लिये लेखिका बधाई की पात्र हैं. विश्वास है कि कविता जी की लेखनी से ऐसे कहानी संग्रह आगे भी पढ़ने को मिलते रहेंगे. पुस्तक प्राप्ति के लिए कविता वर्मा जी से E-mail ID kvtverma27@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

पृष्ठ  : 142
मूल्य : Rs.150/-
प्रकाशक : मानव संस्कृति प्रकाशन, इंदौर


.....कैलाश शर्मा 

Friday, 28 February 2014

“ एक थी माया” – कहानी संग्रह

श्री विजय कुमार जी का कहानी संग्रह ‘एक थी माया’ हाथ में आते ही उसके आवरण ने मंत्र मुग्ध कर एक माया लोक में पहुंचा दिया. जब मैं पुस्तक के पृष्ठ पलट ही रहा था कि मेरी धर्म पत्नी जी मेरे हाथ से पुस्तक लेकर देखने लगीं और बोलीं कि विजय जी की नयी पुस्तक है. मुझे विश्वास था कि उन्हें लम्बी कहानियां पढ़ने का धैर्य नहीं है और उनकी रूचि केवल कविताओं और लघु कथाओं तक ही सीमित है, इसलिए पुस्तक शीघ्र ही मेरे हाथों में वापिस आ जायेगी. लेकिन जब वे पृष्ठ पलटना बंद करके कहानियाँ पढ़ने लगीं तो मुझे आश्चर्य हुआ, लेकिन सोचा कुछ पृष्ठ पढ़ कर अपने आप वापिस कर देंगी. जब एक घंटे तक पुस्तक नहीं मिली तो मैंने उनसे वह पुस्तक माँगी तो उन्होंने कहा कि मैं पढ़ कर ही दूंगी. यद्यपि मैं विजय जी कि कुछ कहानियों से पहले से ही वाकिफ़ था लेकिन जब उन्होंने पूरी पुस्तक पढ़ कर मुझे वापिस दी तो मुझे विश्वास हो गया कि इस कहानी संग्रह की कहानियों में अवश्य कुछ ऐसा है जो किसी को भी अपनी और आकर्षित करने की क्षमता रखता है.

विजय जी की कहानियां एक वृहद कैनवास पर जीवन के विभिन्न आयामों को अनेक रंगों में चित्रित करती हैं जिसमें रूहानी प्रेम का रंग सबसे प्रमुख है. कहानियों को पढ़ते हुए भूल जाते हैं कि कहानी में जीवन है या जीवन में कहानी है. कहानी के चरित्रों से पाठक पूरी तरह आत्मसात हो जाता है और कई बार लगता है कि यह तो मेरी कहानी है और यह किसी भी कहानी की सफलता का सशक्त मापदंड है. सभी कहानियों का कथ्य, शैली, चरित्र चित्रण, और कथा विन्यास सबसे सशक्त पक्ष है.

एक आम आदमी की अभावग्रस्त ज़िंदगी के छोटे छोटे मासूम अहसास और देह से परे निश्छल अनुभूतियाँ, प्रेम और जीवन की आधारभूत ज़रूरतों के बीच संघर्ष और दोनों के बीच पिसता इंसान और उसकी भावनाओं का एक मर्मस्पर्शी चित्रण है ‘एक थी माया’. शरीर से परे भी एक प्रेम है और मिलन ही प्रेम का अंतिम उद्देश्य नहीं, इसे माया ने बहुत गहराई से समझा है “ऐसा कोई दिन नहीं जब मैं तुम्हें याद नहीं करती हूँ, पर तुम नहीं होकर भी मेरे पास ही रहते हो.”

‘मुसाफ़िर’ एक छोटी सी कहानी जीवन में प्रेम से बिछुड़ने और मिलन के लम्बे इंतजार की ऐसी मर्मस्पर्शी कहानी है जिसका अंत आँखें नम कर जाता है.

जब नारी के असंतुष्ट विवाहित जीवन में उसका अतीत फिर से जीवंत हो कर आ जाता है और वह निश्चय नहीं कर पाती की घर की देहरी पार करे या नहीं, उसके मानसिक संघर्ष को चित्रित करती ‘आठवीं सीढ़ी’ एक सशक्त कहानी है. एक लम्बी कहानी होते हुए भी लेखक की चरित्रों, कथानक और भावनाओं पर पकड़ इतनी मज़बूत है कि कहानी कहीं भी उबाऊ नहीं हो पाई और अंत तक पाठक की रोचकता बनी रहती है. नायिका के अतीत के साथ जुड़ने और वर्तमान हालात से असंतुष्टि के बीच मानसिक संघर्ष का जो उत्कृष्ट मनोवैज्ञानिक चित्रण है वह कहानी का सबसे सशक्त पक्ष है. यहाँ भी प्रेम का रूहानी पक्ष प्रखरता से उभर कर आया है. “प्रेम का कैनवास बहुत बड़ा होता है, उसे जीना आना चाहिए, न कि ज़िंदगी में उसकी कमी से भागना. यही सच्चा प्रेम है और इसी को ईश्वरीय प्रेम कहते हैं...”

प्रेम में हर बार चोट खाने पर भी अपने स्वाभिमान को बरकरार रख कर जीने की कोशिश और प्रेम की तलाश है एक भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी कहानी ‘आबार एशो’. “श्रीकांत बहुत देर तक उसे देखता रहा. फिर धीरे से कहा, ‘तुम बहुत बरस पहले मुझसे नहीं मिल सकती थीं, अनिमा?’ अनिमा ने कहा, ‘ज़िंदगी के अपने फैसले होते हैं, श्रीकांत.’ ’’ शायद यही ज़िंदगी का सबसे बड़ा सत्य है.

ऐतिहासिक प्रष्ठभूमि पर एक विश्वसनीय कहानी लिखना और उस समय का वातावरण, भाषा, रहन सहन, लोकाचार एवं चरित्रों को जीवंत करना एक आसान कार्य नहीं है. लेकिन कहानीकार अपनी कहानी ‘आसक्ति से विरक्ति की ओर’ में इसमें पूर्ण सफल रहा है. बुद्धकालीन प्रष्ठभूमि में लिखी कहानी में बुद्ध के संदेशों को न केवल आत्मसात किया है बल्कि उन्हें बहुत गहनता से कहानी में इस कुशलता से ढाला है कि वह कहानी का ही एक अभिन्न अंग बन गए हैं.
“बुद्ध ने आगे कहा, ‘हम अपने विचारों से ही स्वयं को अच्छी तरह ढालते हैं; हम वही बनते हैं जो हम सोचते हैं, जब मन पवित्र होता है तो ख़ुशी परछाई की तरह हमेशा हमारे साथ चलती है, सत्य के रास्ते पर चलने वाला मनुष्य कोई दो ही ग़लतियाँ कर सकता है, या तो वह पूरा सफ़र तय नहीं करता या सफ़र की शुरुआत ही नहीं करता, मनुष्य का दिमाग ही सब कुछ है, जो वह सोचता है वही बनता है, और यही सच्चा सन्यास है.’ “

आधुनिकता और भौतिक सम्रद्धि के पीछे भागते युग में अकेलेपन की त्रासदी झेलती बुजुर्गों की कहानी ‘चमनलाल की मौत’ केवल एक कहानी नहीं बल्कि ऐसी कटु सच्चाई है जो हर रोज़ हम अपने आस पास देखते हैं. आधुनिक पीढ़ी द्वारा दिया अकेलेपन का दंश झेलते जाने कितने बुज़ुर्ग एक पल के प्यार को तरसते हैं अपने ज़िन्दगी के अंतिम पल तक. “ ...लेकिन यह कोई नहीं समझ पाता कि हम बूढों को पैसे से ज्यादा प्यार चाहिए. अपनों का अपनापन चाहिए. हमें ज़िंदगी नहीं मारती; बल्कि एकांत ही मार देता है.” आज के कटु सत्य को दर्शाती कहानी आँखों को नम कर जाती है.

प्रसिद्धि और नाम पाने के लिए व्यक्ति क्या क्या कर सकता है इस पर ‘अटेंशन’ एक बहुत सटीक और रोचक व्यंग है और इस बात का सबूत है कि विजय जी केवल गंभीर कहानी लिखने में ही कुशल नहीं हैं, वे व्यंग के भी सिद्धहस्त चित्रकार हैं.

‘टिटलागढ की एक रात’ कहानी में कहानीकार ने भय, रोमांच, सस्पेंस के वातावरण का कुशलता से ऐसा ताना बुना बुना है कि आप कहानी के प्रवाह के साथ बहते चले जाते हैं और आपकी तर्क शक्ति और व्यक्तिगत सोच बिल्कुल कुंद हो जाती है. कहानी ‘willing suspension of disbelief’ का एक उत्कृष्ट उदाहरण है.

जब दाम्पत्य जीवन में शक का कीड़ा सर उठाने लगे तो तो उसके परिणाम कितने दुखद हो सकते हैं इसको बहुत मार्मिक रूप से प्रस्तुत करती है कहानी ‘दी परफ़ेक्ट मर्डर’. दाम्पत्य जीवन परस्पर विश्वास के धागे में बंधा होता है और जब यह धागा टूट जाता है तो समय निकल जाने पर पश्चाताप करने के लिए भी अवसर नहीं मिलता. कहानी का प्रस्तुतिकरण बहुत प्रभावी और मर्मस्पर्शी है.

‘मैन इन यूनिफ़ॉर्म’ एक सैनिक के दिल के दर्द की कहानी है जो देश के लिए अपनी जान दे देता है लेकिन कुछ नहीं बदलता न देश में न लोगों की सोच में. सटीक प्रश्न, क्या है एक जवान की शहादत की कीमत, उठाती और अंतस को आंदोलित करती एक सशक्त कहानी.

लेखक की कथानक, चरित्रों, भावों और प्रस्तुतीकरण पर पकड़ बहुत मज़बूत है और किसी भी कहानी का कला या भाव पक्ष कमजोर नहीं पड़ता. लेखक का यह प्रथम कहानी संग्रह है और विश्वास है कि उनकी कलम से ऐसे नायाब उपहार पाठकों को मिलते रहेंगे.

ख़ूबसूरत आवरण और उत्कृष्ट प्रस्तुति के लिए प्रकाशक बधाई के पात्र हैं. १५९ पृष्ठ की पुस्तक का मूल्य है रु.२५० जिसे प्राप्त करने के लिए लेखक से संपर्क किया जा सकता है.

विजय कुमार,
मोबाइल : 09849746500

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Tuesday, 15 May 2012

किशोरों में बढ़ती अपराध प्रवृति

समाचार पत्रों में सुबह सुबह हमारे किशोरों की गंभीर अपराधों में शामिल होने की खबरें जब अक्सर देखता हूँ तो पढ़ कर मन क्षुब्ध हो जाता है. कुछ दिन पहले समाचार पत्रों में खबर थी कि चार किशोरों ने कक्षा से १२ साल के लडके को बाहर खींच कर निकाला और चाकुओं से उसे घायल कर दिया. उसका कसूर केवल इतना था कि उसने कुछ दिन पहले अपने साथ पढने वाली मित्र को उनके दुर्व्यवहार से बचाया था. इसी तरह की एक घटना में एक किशोर ने अपने साथी का इस लिये खून कर दिया क्यों कि उसे शक था कि उसने उस पर काला जादू किया है. कुछ समय पहले एक और दिल दहलाने वाली खबर पढ़ी कि एक १५ साल के किशोर ने अपनी पडौस की महिला से ५० रुपये उधार लिये थे और जब उस महिला ने यह बात उसकी माँ को बता दी तो उसे इतना क्रोध आया कि उसने उसके घर जा कर उस महिला पर चाकू से हमला कर दिया और जब उसकी चीख सुन कर पडौस की दो महिलायें बचाने के लिये आयीं तो उसने उन पर भी हमला कर दिया और तीनों महिलाओं की मौत हो गयी. एक छोटी जगह की इसी तरह की एक खबर और पढ़ी थी कि स्कूल से अपने साथी के साथ लौटते हुए एक लडकी को उसके साथ पढने वाले ४,५ साथियों ने रास्ते में रोक कर लडकी के साथ सामूहिक बलात्कार किया. अपने ही साथ पढ़ने वाले साथी का फिरौती के लिये अपहरण और हत्या के कई मामले समाचारों में आये हैं. बलात्कार, लूट, वाहन चोरी, जेब काटना, चोरी करने आदि के समाचार तो बहुत आम हो गये हैं. छोटी उम्र से शराब और ड्रग्स का प्रयोग एक सामान्य शौक बन गया है. आज के किशोरों का व्यवहार देख कर समझ नहीं आता कि इस देश की अगली पीढ़ी का क्या होगा.

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Saturday, 10 March 2012

बुजुर्गों में बढ़ती असुरक्षा की भावना


एक समय था जब बुज़ुर्गों की तुलना घर की छत से की जाती थी जिसके आश्रय में परिवार के सभी सदस्य एक सुरक्षा की भावना महसूस करते थे, लेकिन आज वही छत अपने आप के लिये सुरक्षा की तलाश में भटक रही है. टूटते हुए संयुक्त परिवार, निज स्वार्थ की बढती हुई भावना, शहरों में परिवार के सदस्यों का रोज़गार के लिये पलायन, नैतिक और सामजिक जिम्मेदारियों का अवमूल्यन जैसे अनेक कारण हैं जिनके कारण बुज़ुर्ग आज परिवार में एक अनुपयोगी ‘वस्तु’ बन कर रह गये हैं.

बुजुर्गों में बढती हुई असुरक्षा के अनेक रूप हैं. कुछ बुज़ुर्ग आर्थिक रूप से पूर्णतः समर्थ हैं, लेकिन उनकी भी अनेक समस्याएं हैं. जीवन के अंतिम पड़ाव में उन्हें ज़रूरत है अपनों के प्यार और कुछ समय के साथ की. उनके बच्चों की कुछ मज़बूरियां हो सकती हैं, विशेषकर उनकी जो विदेश में नौकरी और रोज़गार के लिये बस गये हैं. लेकिन कुछ ऐसे परिवार भी हैं जिनके बच्चे उसी शहर, कई बार उसी घर में रहते हैं लेकिन उनके बच्चे पास होते हुए भी दूर होते हैं. उनके पास हर चीज के लिये समय है सिर्फ़ माता पिता से कुछ समय मिलने और बात करने को छोड़ कर. बच्चों का यह व्यवहार अक्सर इन बुजुर्गों की मानसिक पीड़ा का कारण होता है. सब कुछ होते हुए भी अकेलेपन की पीड़ा का दर्द भोगते इन बुजुर्गों की स्तिथि सचमुच शोचनीय है. क्या केवल प्रेम की अपेक्षा करना भी गुनाह है?

लेकिन कुछ बुज़ुर्ग ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने सभी सीमित साधन बच्चों को अच्छी शिक्षा देने में लगा दिए और अपने भविष्य के लिये कुछ नहीं बचा पाए यह सोच कर कि बच्चे अगर अच्छी तरह स्थापित हो गये तो उन्हें बुढापे में कोई चिंता नहीं होगी. लेकिन बच्चे समर्थ होने पर भी माता पिता को भूल जाएँ और और यह कह कर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड लें कि उनके माता पिता ने जो किया यह उनका फ़र्ज़ था और सभी माता पिता यह करते हैं, तो उन माता पिता के दर्द को आप आसानी से समझ सकते हैं. भारत में सामजिक सुरक्षा की कोई संतोषजनक व्यवस्था न होने के कारण उनका जीवन किस तरह निकलता होगा इस की सहज कल्पना की जा सकती है. यह सही है कि कानून बच्चों को माता पिता की आर्थिक सहायता के लिये बाध्य कर सकता है, लेकिन कितने माता पिता मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से यह कदम उठाने और अदालतों के चक्कर लगाने में समर्थ हैं.

बुजुर्गों का परिवार में उत्पीडन, नौकरों या असामाजिक तत्वों द्वारा उनकी हत्या आदि समाचार लगभग रोज ही पढने  को मिल जाते हैं. आर्थिक रूप से असहाय बुजुर्गों के लिये सामाजिक सुरक्षा की सरकार की ओर से  कोई सार्थक योजना न होने के कारण हालात और भी दुखद हो जाते हैं. जिन्होंने अपने जीवन के स्वर्णिम वर्ष परिवार और समाज के लिये दे दिये क्या उन्हें अपने जीवन का अंतिम समय सुख और शान्ति से जीने का अधिकार नहीं? सरकार द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर बुजुर्गों को जो नाम मात्र की पेंशन दी जाते है क्या उसमें किसी व्यक्ति का गुज़ारा संभव है? जब न तो परिवार और न समाज ही उनकी जिम्मेदारी लेने को तैयार है तो ये बुज़ुर्ग इस उम्र में किस की ओर हाथ बढ़ाएँ? हम ये न भूलें कि सभी को एक दिन इस अवस्था से गुजरना होगा.

बचपन में सुनी एक कहानी याद आती है. एक समृद्ध पारिवार में बुज़ुर्ग पिता के साथ बहुत ही दुर्व्यवहार होता था और उनको खाना भी अलग से पत्तल और मिट्टी के सकोरे में दिया जाता था जिन्हें बाद में फेंक दिया जाता था. उस परिवार में एक छोटा बच्चा रोज यह देखता था. उसने एक दिन वह पत्तल और मिट्टी का सकोरा पानी से धो कर रख दिया जिसे देख कर उसके पिता ने पूछा कि वह ऐसा क्यों कर रहा है. बच्चे ने कहा कि पिता जी जब आप बुड्ढे हो जायेंगे तो आपके लिये भी तो खाना खिलाने को पत्तल और मिट्टी के सकोरे की जरूरत पड़ेगी. नए खरीदने में पैसा खर्च करने की बजाय ये धुले हुए पत्तल सकोरे ही आपके काम आ जायेंगे. बच्चे की बात सुनकर पिता की आँख खुल गयीं और उस दिन से उसका व्यवहार अपने पिता के प्रति बदल गया.

बुजुर्गों की समस्याओं के बारे में आज पारिवार, समाज और सरकार सभी को मिल कर सोचना होगा, वर्ना फ़िर हमें शायद अपनी भूल सुधारने का भी अवसर न मिले और जब हम उस अवस्था को पहुंचें तो और भी बदतर हालातों का सामना करना पड़े.

कैलाश शर्मा